Friday, 12 August 2011


जहां ना तेरी महक हो उधर ना जाऊं मै
मेरी सरिश्त सफ़र है गुज़र ना जाऊं मै
[sarisht=nature]मेरे बदन में खुले जंगलों की मिटटी है
मुझे सम्हाल के रखना बिखर ना जाऊं मै
मेरे मिज़ाई में बेमानी उलझाने है बहुत
मुझे उधर से बुलाना जिधर ना जाऊं मै
[be-maanii=meaningless]
कहीं पुकार ना ले गहरी वादियों का सबूत
किसी मक़ाम पे आकर ठहर ना जाऊं मैं
[sabuut=silence]
ना जाने कौन से लम्हे की बद्दुआ है ये
करीब घर के रहूं और घर ना जाऊं मै - निदा फ़ाज़ली 

हर घडी खुद से उलझाना है मुक़द्दर मेरा
मैं ह़ी कश्ती हूँ मुझी में है समंदर मेरा 
किससे पूछु की कहाँ गुम हूँ बरसों से
हर जगह ढूंढता फिरता है मुझे घर मेरा 
एक से हो गए मौसमों के चेहरे सारे
मेरी आँखों से कहीं खो गया मंज़र मेरा  
मुद्दतें बीत गई ख़्वाब सुहाना देखे 
जगता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा 
आईना देखके निकला था मैं घर से बाहर
 आज तक हाथ में महाफुस है पत्थर मेरा -निदा फ़ाज़ली

अब ख़ुशी है ना कोई गम रुलाने वाला
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला
उसको रुक्षत किया था मुझे मालूम ना था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला
इक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सब की दुनिया  
कोई  जल्दी मै कोई देर से जाने वाला 
एक बे-चेहरा सी उमीद है चेहरा- चेहरा 
जिस तरफ देखिये आने को है आने वाला -निदा फ़ाज़ली 
  धुप में निकलो घटाओं मन नहा कर देखो 
ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटा कर देखो वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो 
पत्थरों में भी जुबां होती है दिल होते है
अपने घर की दारोदिवार सजा कर देखो 
फासला नज़रों का धोखा भी हो सकता है 
वो मिले या ना मिले हाथ बढाकर देखो  -निदा फ़ाज़ली 

कभी उससे भी मेरी दोस्ती थी - फिराक गोरखपुरी


ये माना ज़िन्दगी है चार दिन की 
बहुत होते है यारों चार दिन भी 
खुदा को पा गया वाइज़ मगर है 
ज़रूरत आदमी को आदमी की  
मिला हूँ मुस्कुरा के उस से हर बार 
मगर आँखों में भी थी कुछ नमी सी 
मुहबत मै कहे क्या हाल दिल का 
ख़ुशी ह़ी काम आती है ना गम ह़ी 
भरी महफ़िल में हर एक से बचाकर 
तेरी आँखों ने मुझ से बात कर ली  
लड़कपन की अदा है जानलेवा 
गज़ब की छोकरी है हाथ भर की
रकीब-इ-ग़मज़दा अब सबर कर ले 
कभी उससे भी मेरी दोस्ती थी - फिराक गोरखपुरी 

Wednesday, 10 August 2011


ना मुहबत ना दोस्ती के लिए 
वक़्त रुकता नहीं किसी के लिए 
दिल को अपने सजा ना दे यू ह़ी 
इस ज़माने की बेरुखी के लिए 
कल जवानी का हश्र क्या होगा 
सोच ले आज दो घडी के लिए 
हर कोई प्यार ढूँढता है यहाँ 
अपनी तनहा सी ज़िन्दगी के लिए 
वक़्त के साथ साथ चलता रहे 
यही है बेहतर आदमी के लिए 

ना मुहबत ना दोस्ती के लिए 
वक़्त रुकता नहीं किसी के लिए 
दिल को अपने सजा ना दे यू ह़ी 
इस ज़माने की बेरुखी के लिए 
कल जवानी का हश्र क्या होगा 
सोच ले आज दो घडी के लिए 
हर कोई प्यार ढूँढता है यहाँ 
अपनी तनहा सी ज़िन्दगी के लिए 
वक़्त के साथ साथ चलता रहे 
यही है बेहतर आदमी के लिए